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अंकों में सिमटी प्रतिभा की कसौटी

-डॉ विजय गर्ग
आज का शिक्षा तंत्र एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विद्यार्थियों की प्रतिभा को अक्सर केवल अंकों की तराज़ू पर तौला जाता है। परीक्षा परिणाम आते ही बच्चों को “प्रतिभाशाली” या “कमज़ोर” घोषित कर दिया जाता है। कक्षा 10 और 12 के बोर्ड परिणाम—चाहे वह सीबीएसई हो या स्टेट बोर्ड—समाज में प्रतिष्ठा और भविष्य की दिशा तय करने वाले मान लिए जाते हैं। पर क्या वास्तव में कुछ अंकों से किसी की संपूर्ण क्षमता का आकलन संभव है?

अंक: मूल्यांकन या सीमांकन?

अंक मूलतः सीखने की प्रगति मापने का साधन हैं, लेकिन जब यही साधन लक्ष्य बन जाता है, तो शिक्षा का उद्देश्य सीमित हो जाता है। विद्यार्थी रचनात्मकता, जिज्ञासा और समझ की जगह रटने और अंक प्राप्त करने की दौड़ में लग जाते हैं। परिणामस्वरूप ज्ञान का विस्तार नहीं, बल्कि परीक्षा-केंद्रित सोच विकसित होती है।

प्रतिभा का व्यापक अर्थ

प्रतिभा केवल गणित या विज्ञान में उच्च अंक लाने तक सीमित नहीं है। कला, संगीत, खेल, लेखन, नेतृत्व, संवेदनशीलता, समस्या-समाधान क्षमता—ये सभी प्रतिभा के विविध आयाम हैं। इतिहास गवाह है कि कई महान व्यक्तित्व पारंपरिक परीक्षा प्रणाली में औसत रहे, फिर भी उन्होंने समाज को नई दिशा दी। इसका अर्थ यह नहीं कि पढ़ाई महत्वहीन है, बल्कि यह कि प्रतिभा बहुआयामी होती है।

मानसिक दबाव और सामाजिक तुलना

अंकों की होड़ ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला है। तुलना, अपेक्षाएँ और असफलता का भय आत्मविश्वास को कम करते हैं। कई विद्यार्थी अपनी रुचियों को त्यागकर केवल “सुरक्षित” करियर विकल्प चुनते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी मौलिकता और आनंद खो जाता है।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करना है। समालोचनात्मक सोच, नैतिक मूल्यों की समझ, संवाद कौशल, और सामाजिक संवेदनशीलता—ये गुण अंक-पत्र में नहीं दिखते, पर जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं।

समाधान की दिशा

  • 1. समग्र मूल्यांकन प्रणाली – प्रोजेक्ट, प्रस्तुति, व्यवहारिक कार्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति को महत्व दिया जाए।
  • 2. अभिभावकों की सोच में बदलाव – बच्चों की तुलना करने की बजाय उनकी रुचियों को समझा जाए।
  • 3. विद्यालयों में परामर्श सेवा – विद्यार्थियों को तनाव प्रबंधन और करियर मार्गदर्शन मिले।
  • 4. कौशल आधारित शिक्षा – पाठ्यक्रम में जीवन-कौशल और व्यावहारिक ज्ञान को शामिल किया जाए।
  • 5. रुचि-आधारित प्रोत्साहन – खेल, कला और साहित्य को भी उतना ही महत्व मिले जितना अकादमिक विषयों को।

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